महापर्व डाला छठ कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के चतुर्थी तिथि से आयोजित होकर सप्तमी तिथि को समाप्त होने वाला यह पर्व यूँ ही नहीं कहलाता है महापर्व। इसके महापर्व कहलाने के पीछे दर्जनों ऐसे कारण है जो इसे महापर्व की श्रेणी में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर देते हैं। सनातनी समाज का कोई ऐसा तबका नहीं है जो इससे न जुड़ा हो। अपने विधि-विधान, पूजन पद्वित, हास-परिहास, उत्सव जैसा माहौल, प्रकाश, सफाई क्या कुछ नहीं इसके अंदर। समाज का हर अंग इस पर्व में दोना हाथ बढ़ा कर सेवा के लिए तैयार रहता है। अमीरी-गरीबी का भेद मिटाते इस पर्व में एक गिरते को थामने के लिए हजारो हाथ उठ खड़े होते हैं। इस व्रत को करने वाली व्रती के घर यदि कोई नहीं है, तो भी उसे पता नहीं चलता कि कब उसका यह व्रत पूरा हो गया। संसाधन नहीं है तो हजारो हाथ खड़े है। सामाग्री नहीं तो भी हजारो हाथ खड़े हैं।
लोक-परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइयाका संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद राम-राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य की यही पद्धति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने का भी उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। उसकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया था। एक अन्य कथा के अनुसार राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि “सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो।” राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
पहला दिन – व्रत का पहला दिन लौका-भात या लौकी-भात का होता है। व्रती सुबह उठकर पूजन इत्यादि कर लौकी की सब्जी, चना की दाल एंव चावल खाते है। जब तक व्रत करने वाला भोजन नहीं कर लेता इस दिन परिवार का कोई सदस्य भोजन नही करता। व्रती के भोजन के बाद गेहूँ एवं अन्य प्रसाद बनाये जाने वाले अन्न को धो कर धूप में सुखाया जाता है। आज का भोजन परम्परा के अनुसार आम की लकड़ी पर बनता है। अब कई घरो में आम की लकड़ी के आभाव में गैस चुल्हे की सफाई कर भोजन बनाने की प्रथा शुरू हो गई है।
दूसरा दिन- आज का दिन खरना के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह से व्रती निरजला व्रत रखते हैं और रात को केले के पत्ते पर, परिवार के सदस्यो की संख्या के हिसाब से पूड़ी, गुड की बनी खीर, ठेकुआ और फल रख कर छठ माँ की आराधना करते हैं। आराधना के उपरान्त चढ़ाई हुई पूरी और खीर खुद खाती हैं। व्रती के भोजन के दौरान कोई भी जाने-अंजाने व्रती का नाम लेकर पुकारता है और व्रती के कानो में अगर वह आवाज चली गयी तो व्रत उसी समय भोजन करना छोड देगी चाहे वह एक निवाला भी नही खाया हो । और इसके बाद परिवार के सभी सदस्य उस पूजन स्थल पर सिर नवा कर प्रसाद ग्रहण करते है। इस प्रकार पर्व का दूसरा दिन खराना पूरा हो जाता है।
तीसरा दिन- आज का दिन अद्भूत होता है। सुबह से ही प्रसाद खरीदने वालो की भीड़ बाजारों में दिखाई देने लगती है। बाजार में चारो तरफ फल-फूल, गन्ना, दउरा, कोशी इत्यादि दिखाई देते हैं। घरों के अन्दर महिलाओं द्वारा प्रसाद के रूप में ठेकुआ इत्यादि आम की लकड़ी जला कर चूल्हे पर बनाया जाता है। दोपहर होते ही सारा प्रसाद एक दउरे या बाँस की ढाल में रख कर कर उसे साफ कपड़े से बाँधने का कार्य शुरू हो जाता है। लगभग तीन बजे घर की महिलायें व्रती को साथ लेकर गंगा या किसी अन्य जलाशय की तरफ प्रस्थान कर जाती है। छठ के पराम्परिक गीत गाते हुए गंगा घाट पर जाती औरतें, घर से नंगे पावों सिर पर डाल और दऊरा उठाये गंगा घाट जाते युवक, सोलह शृंगार में सजी हुई नव-विवाहिताये होती हैं। हर तरफ मंत्र-मुग्ध कर देने वाला वातावरण होता है। सूर्य देव के क्षितिज की राह पकड़ते ही व्रती गंगा या जलाशय में खड़े होकर कठिन अराधना के साथ दूध का अर्घ्य देना शुरू कर देते हैं। जिसके घर में जितने पुरूष होते है सूपो की संख्या उतनी ही होती है। हर सूप को गंगा के पानी से सटा कर उस पर दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस पूजा के बाद गंगा घाट पर आज की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सभी अपने अपने घर को चले जाते है । जिन परिवारो में पूरे साल कुछ भी शुभ हुआ रहता है वह परिवार आज शाम को कोसी भरते है।
कोषी भरने की रस्म- अगर परिवार में कोई शुभ काम, शादी-विवाह, वंश वृद्धि हुई है तो रात में कम से कम 5 औरतें मिल कर घर के आगँन में छठ मईया के गीत गाते हुये पाँचों खोइछा (एक कपड़े में हल्दी, दूभ, कुछ पैसे, कुछ फल रख कर बाँध दिया जाता है) बँधे हुए गन्ने आपस में जोड कर कर खड़े कर दिये जाते है। खड़े गन्ने की बीच की जगह में कोषी में दीप प्रज्जवलित कर फल-प्रसाद रख दिया जाता है। जिससे कोषी भरना कहा जाता है। इस कोषी केा सुबह फल फूल सहित गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।
चौथा या अंतिम दिन- छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन काफी सुहावना होता है। सुबह तड़के परिवार के सदस्य स्नान-ध्यान करके डाल-दउरा उठा कर घाट की तरफ चल देते हैं। आज का दिन विशेष कर बच्चों के लिए खुशियो का दिन होता है। घर में बन रहे पकवानो, प्रसादो एवं रखे फल-फूल जिस पर उनकी नज़रे रहती थी, जिसे वह छू भी नहीं सकते थे,आज वह उसे खा सकेगें। व्रती एवं उसके परिवार की अन्य महिलाएं पारम्परिक गीत खाते हुए गंगा घाट पर पहुँचती हैै। सूर्य देव के उदय के समय व्रती गंगा के पानी में खडे़ हेाकर सूर्य की उपासना करते हैं।। सूर्य उदय के बाद दूध उनको अर्घ्य देते हैं। नदी के किनारे ही हवन पूजन कर के व्रत समाप्त करते है। सुबह के पूजन के उपरान्त बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी घाट पर घूम कर सबसे प्रसाद माँग कर खाते हुए देखे जाते है। घर आकर व्रती कोषी भरने वाली औरतो केा प्रसाद देती है। और उसके बाद भेाजन कर व्रत खत्म करती है। उसके बाद यह महापर्व समाप्त हो जात है।
- सर्वप्रथम यदि आपके पास संसाधन एवं धन नहीं है तो परेशान मत हो, यह पर्व पान-सुपाड़ी, दीपक, सिंदूर, कुछ फल एवं नये के जगह साफ कपड़े पहन कर भी किया जा सकता है। सनातन धर्म में सामान एवं विधि का महत्व भाव,श्रृद्धा और विश्वास से बहुत कम है। सूर्य देव एवं छठ माता के प्रति भाव-विश्वास रखें। सामान संसाधन आप तक खुद पहुॅंचेगा। सामान को भाव पर हावी मत होने दे, हसते रहें।
- सफाई का विशेष ध्यान रखें, गेहूॅं सुखाने से लेकर खरना के प्रसाद, शाम-सुबह के अर्ध्य तक के पूजन सामाग्री एवं प्रसाद को मानव तो मानव पशु-पक्षी तक को जूठा मत करने दें,पैर मत लगने दें।
- चारो दिन जमीन पर सोयें, सांसारिक बातो से दूर रहे, भगवान का ध्यान करते रहें।परिवार में किसी को लहसुन-प्याज, मॉंस-मदिरा, का सेवन मत करने दें।
- अपने साथ साथ दूसरो के व्रत में भी यथा-संभव मदद/सहयोग करें, रास्ता बनाने, अर्ध्य देने, प्रकाश इत्यादि में सहयोग करें। यह आपको पुण्य का फल देगा।
- खरना के दिन व्रती के भोजन करते समय किसी प्रकार की आवाज न होनें दें। वह आवाज जिस पर आपका वश नहीं है जैसे चलती रेल, यातायात, प्राकतिक आवाज का व्रती के भोजन पर प्रभाव नहीं पड़ता। व्रती के भोजन करते समय उनका नाम किसी भी प्रकार से उनके कान में नहीं जाना चाहिए, बच्चों को भी घर से बाहर कर लें।
- सूपो की संख्या परिवार के पुरूष सदस्यों के संख्या के बराबर होती है।
- शाम के अर्ध्य के समय जो फल-फूल-प्रसाद सूप में रहते हैं उसे सुबह के अर्ध्य के पहले अवश्य बदल लें, एक बार का चढ़ाया फल प्रसाद दुबारा नहीं चढ़ता।
- अर्ध्य देते समय सूप में रखा दीपक जलता हुआ रहना चाहिए।
- चैतीय नवरात्रि के बाद यदि परिवार में कोई मृत्यु हुई रहती है तो उस वर्ष छठ घर में नहीं होता है।
- महिलाएं अपना पहला छठ अपने पीहर से ही शुरू करती हैं, लेकिन ऐसा कोई अति-आवश्यक नहीं है।
- प्रसाद बनाने के लिए ऐसे चुल्हे का प्रयोग करें जिस पर कभी नमक का सामान या मांसाहार न बना हो, सबसे उत्तम मिट़्टी का चुल्हा व आम की लकड़ी होती है। प्रसाद में ठेकुआ, कचमनिया, चावल के लड़डू अवश्य बनायें।
विशेष- छठ महापर्व की कुछ परम्पराएं कुछ विधान हर जगह के अलग अलग होते हैं, इस लिए निसंकोच अपने क्षेत्र के बूढ़े-बुजुर्गो से बात कर जानकारी प्राप्त कर ही इस व्रत को करें। उत्तम रहेगा। गलत से पूछ अच्छी।

ठेकुआ, चावल के लड्डू व कचवनिया ऐसे बनायें।
छठ पूजन के पूजन सामाग्री एवं अन्यछठ पूजा के पारम्परिक गीत
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