शिव भगवान का आध्यात्मिक, पौराणिक तथा शास्त्रीय महत्व-डॉ.नीलिमा तिग्गा

सनातन संस्कृति शास्त्र अर्थात सायंस, गणित, अध्यात्म एवं आकाशीय शक्तियों का मिला-जुला संगम है Iहमारे दैनंदीन व्यवहार, पूजा-अर्चना विधि, रीती-रिवाज इसीके अनुसार होते है I कोई भी देवी-देवताओं को फलां फूल-पत्र चढ़ाना हों या भिन्न प्रकार के नैवेद्य जिसे प्रसाद भी कहते है, अर्पण करने के पीछे भी शास्त्रोक्त परिपाठी है I आर्य जन सृष्टि की पूजा-अर्चना करते थे I सृष्टि में अंतरिक्ष में होने वाली हलचल और सृष्टि संपदा अर्थात जल,वायु, वनस्पती आदि का मानव जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव और उसका निराकरण इन सब का यथायोग्य अभ्यास कर हमें बहुत कुछ दिया हैं Iआर्यों में मूर्ति पूजा नहीं थी, परंतु लगता है कि कालांतर से आम जन-मानस को समझाने के लिए सृष्टि के रहस्यों का प्रतीकात्मक स्वरूप अर्थात मूर्त स्वरूप को दिखाने का कार्य भी किया जो रूपकात्मक है I मानव मर्त्य अर्थात मृत्यु को प्राप्त करने वाला परंतु मूर्त स्वरूप अर्थात अमर स्वरूप है I ये मूर्त ही मूर्ति या प्रतीकात्मक स्वरूप है I

डॉ.नीलिमा तिग्गा

आज इस शोध आलेख में शिव अर्थात ज्योतिर्लिंग क्या है, उसका आध्यात्मिक स्वरूप एवं शास्त्रीय महत्व पर विचार व्यक्त किए हैं I हो सकता है कि मेरे विचारों से आप भिन्न धारणा रखते होगे, लेकिन यह शोध आलेख संदर्भों का अध्ययन एवं निजी अनुभव के आधार पर लिखा है I सावन महिना आते ही शिव भगवान के लिए हमारी परंपरा के अनुसार पूजा अर्चना भी चालू हो जाती है I यह परंपरा भारत में पुरातन काल से चली आ रही  है I आज शिव का वास्तव स्वरूप क्या है? क्या वाकई शिव भगवान है या आदि पुरुष है? या शिव का आध्यात्मिक रूप एक अलग ही व्याख्या दिखाता है? शास्त्रीय दृष्टी से भी इसका क्या महत्व है? इसी पर आज इस लेख द्वारा कुछ तथ्यात्मक और रोचक प्रकाश डालने के लिए यह प्रयास मात्र है Iहमारे वेद श्रुति द्वारा अर्थात सुन-सुनकर नित्य पठन से मुखोद्गत कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमें ज्ञान मिला है I एक काल ऐसा आया कि कुछ तथाकथित विद्वानों ने हमारे वेदों के श्लोकों के अर्थ बड़ी चतुराई से बदलकर हमें मूल श्लोंकों का कुछ गलत अर्थ बताकर जन मानस को मनगढ़ंत कहानियों द्वारा भ्रमित किया और उसे ही सत्य मानकर हम आगे बढ़ते गये I

शिव एक आध्यात्मिक तत्व –  

  शिव का शाब्दिक अर्थ शून्य है यानी जो नहीं है I जहाँ शून्य होगा वहाँ ही निमार्ण कार्य भी होगा I वेदों की उत्पत्ति ही ब्रह्माण्ड के ज्ञान से हुई I ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल, तारे, ग्रह और उसके पृथ्वी पर होने वाले प्रभाव इन सब का ज्ञान ही वेड हैं I ब्रह्माण्ड से निकलने वाली ध्वनि, ओंकार से ही ईश्वर का अनुभव हुआ I ईश्वर अर्थात दैवीय शक्ति, इस शक्ति का निर्माता शिव यानी सत्य है I ब्रह्मा याने ब्रह्माण्ड है I बाद में जैसा कि बताया इन्हें एक स्वरूप देकर उसके ऊपर कहानियां गढ़कर हमें मूल सत्य से भटकाया है Iआकाश में जो उल्का पिंड या ग्रह है उसीके आकार से शिव शक्ति का प्रतिक अर्थात शिवलिंग है I (जिसे भ्रामक ज्ञान से, विकृत बुद्धी से कुछ अराजक तत्वोंने योनी बताया गया है I) शिव का निवासस्थान कैलाश पर्वत जो सब से ऊँचा पर्वत है उसे बताया गया है I (नासा ने जैसे ब्रह्माण्ड में होने वाली ध्वनि ओंकार को भी परिक्षण के बाद सत्य माना वैसे ही कैलाश पर्वत की तस्वीरें भी कुछ खोजी लोगों ने ली और कुछ आश्चर्यजनक सत्य उन्हें मिले I जैसे मंदिरों में मुर्तिशिल्प उकेरते है, वैसे ही मुर्तिशिल्प वहाँ भी दिखे जिसका विडियो भी आया है I

आम जनता को शिव अर्थात शक्ति का महत्व बताने के लिए श्लोक या स्तोत्र बनाये, जिन्हें जैसा ऊपर कहा कि मनगढ़ंत कहानियों में बदला गया I यह भी देखा गया कि कुछ श्लोकों का गलत अर्थ निकालकर भ्रामक कल्पनाओं से मनुष्य को भटकाया है Iशिव को नटराज भी कहते है I नट अर्थात कला और कलाओं पे राज करने वाला वह नटराज I नटराज को प्रतीकात्मक स्वरूप में अर्ध नारी नटेश्वर का नृत्य करते हुए जो मूर्ति दिखलाते है उसका श्रेय योग श्रुषी पातंजली को है I इन्होने दक्षिण भारत के चिदंबरम में नटराज की भव्य मूर्ति स्थापित की है I जब सृष्टि को आनंद होता है तो वह नृत्य करने लगती है I अब ये आनंद क्या है? अच्छी वर्षा होकर सब तरफ सृष्टि, हरियाली चादर ओढ़कर उसे पुष्पों से सजाकर, फूलों से वर्षा करती है I सागर, नदियाँ भी जलमय होकर धरती पर कृषि उत्पादन में अपना सहयोग देती हैं I इस समय आकाश भी शांत रहता है I तो यह है नटराज, शिव तांडव की कल्पना I क्रोधित आकाश का तात्पर्य तूफ़ान आना या प्रलय जिस से पृथ्वी पर हानि होती है I सृजन और विनाश के यह दो रूप ही नटराज का नृत्य और तांडव है I    

शिव तांडव नृत्य के दो प्रकार हैं I प्रलयकारी शिव तांडव और दूसरा आनंद तांडव जो निमार्ण का प्रतिक है I नटराज की सम्पूर्ण आकृति ओंकार स्वरूप दिखती है, यह इस बात को दर्शाती है कि ओम शिव में ही निहित है I नटराज एक बौने राक्षस के ऊपर नृत्य करते हुए दिखाई देते है I बौना राक्षस अर्थात अज्ञान या अंध:कार जिसका हनन कर शिव जी ज्ञान देकर ज्ञान का उजियारा फैलाते हैं I एक हाथ में अग्नि विनाश का प्रतिक है जिसे शिव शक्ति फिर से ब्रह्माण्ड अर्थात ब्रह्मा को देकर फिर से सर्जन करने कहती है I कल्पना का मूर्त स्वरूप ये मूर्तियां हैं जो आपको मंदिरों में या गुफाओं में भी दिखती हैं I अब शिव का दूसरा पाँव मुक्त है,उठा हुआ स्वतंत्र है I यह मनुज के सार्वभौम स्वतंत्रता का प्रतिक है I ये स्वतंत्रता तभी मिलेगी जब आप अज्ञान के अंधकार को अग्नि में स्वाहा कर फिर से ज्ञान प्राप्ति के तरफ आकर ज्ञान प्राप्ति करे Iशिव का नटराज स्वरूप हमेशा नृत्य करता रहता है I नृत्य यानी गति, भ्रमण, हलचल है I यदि हम एक ही जगह स्थिर होगे तो यह स्थिरता ज्ञान, कर्म, प्रगति में बाधक है I ये है शिव का आध्यात्मिक स्वरूप I 

शिव का पौराणिक स्वरूप – पौराणिक मान्यता अनुसार शिव कैलाश पर्वत पर रहने वाला एक योगी है, जो हमेशा पञ्च महाभूतों से घीरा रहता है I हिमालय पर्वत ने अपनी पुत्री पार्वती का शिव से विवाह कर दिया और इसीके चलते बाद में अनेक कहानियों का जन्म हुआ. या इसलिए भी ऐसा किया होगा कि अज्ञानी समाज पर इन कहानियों द्वारा कुछ भी बताया जाए I (यदि अध्यात्म सीखाते तो शायद समाज को यह गूढ़ ज्ञान एकदम आत्मसात नहीं होता I) शिव को श्मसान में रहने वाला, डमरु वाला, वस्त्र के नाम पर मृगाजीन, बदन पर राख मलकर बैल(नंदी) पर सवारी करने वाला जोगी स्वरूप बताया है.

अब इस स्वरूप को विस्तार से देखिए I शून्य से जीव उत्पन्न होता है परंतु इस जीव को सिर्फ़ मोह माया में मगन नहीं रहना है तो सांसारिक तथ्य को जानना है I पंचमहाभूत अर्थात सृष्टि के पांच तंत्व जिन से शरीर बनता है I आप बड़े हो गये, ज्ञान प्राप्ति कर ली, गृहस्थ बने और अंत में सभी सुखों का त्याग कर के आप सत्य की खोज में बैरागी बनकर भ्रमण करने निकले और अंत में पूरी तरह से भौतिक सुख, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के बाद सब छोड़कर बैरागी बनकर श्मसान में गहरी शांतता में बैठकर इहलोक का त्याग कर दिया I आपका वाहन बैल है I बैल कृषि का या भोलेपन का प्रतिक तो नंदी  नपुंसकता का प्रतिक है I ज्ञान के या विचारों के भोलेपन पर अर्थात मूढ़ता पर विजय प्राप्त कर ली I इस नपुंसकता पर (ज्ञान की नपुंसकता) पर आपने विजय प्राप्त की I

आपके वस्त्र केवल मृगाजीन है, अर्थात जो मिला उसी में संतुष्टि कर ली I अब ये बात और है कि शिव को भ्रामक कहानियों द्वारा गलत ढंग से पेश किया गया है.( जिसका यहाँ उल्लेख करना मेरा फिर से अज्ञान में जाना होगा I) अब देखते है कि शिव के हाथ में डमरू या त्रिशूल का क्या महत्व है I त्रिशूल सत, तम और रज गुणों का संगम है I सत अर्थात सात्विक, सौम्य रूप, तम याने सुस्ती, आलस्य , कलह, बुरे कर्म तथा विचार आदि हैं I रज अर्थात राजसी गुण, जैसे एक राजा के होते हैं I सुख विलास, वैभव, अहंकार , हमेशा यश की, स्त्री की कामना करते रहना ये रज गुण हैं I हाथ में त्रिशूल है अर्थात इन त्रिगुणों को वश में करना है I किसी भी गुण के आधीन न होकर निष्काम कर्म करना, सत्य वचन कहना, शुचिर्भूत रहना यही त्रिशूल दर्शाता है I

डमरू क्या दर्शाता है? –ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई I जैसे ओंकार, आकाश में घर्षण या ग्रहों के भ्रमण से उत्पन्न नाद है वैसे ही डमरू से भी नाद उत्पन्न होता है I डमरू से चौदह प्रकार की ध्वनि या आवाज निकलती हैं  जिसे पुराणों में मंत्र माना गया है और उसमे सृजन और विध्वंस दोनों के स्वर छिपे हैं I आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रह्माण्ड में निकलती आवाज एवं हृदय की धडकनों की आवाज में समानता है. I पुराने जमाने में केवल डमरू के आवाज से रोग भी दूर करते थे I डमरू बजाने के चौदह प्रकार है अर्थात चौदह प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती हैं I हर रोग के लिए अलग ध्वनि है I डमरू बजाना भी एक कला है, साधना है I कैसे भी बजाने से उद्देश सफल नहीं होता I

शिव गले में रुद्राक्ष माला पहनते है I यह तो सर्व विदित है कि उच्च रक्तदाब या ह्रदय रोग के लिए रुद्राक्ष बहुत लाभकारी है, मस्तिष्क को शान्ति मिलती है और हर प्रकार का तनाव दूर हो जाता है Iशिव के गले में साँप याने सांसारिक जहर जिसे भी उन्होंने पी लिया है I कोई भी कटू शब्द, क्रोध, लालच, माया आदि संसारिक जहर को पचा लिया है I इस जहर को भी उन्होंने गले में ही रख दिया उसे पेट के अंदर नहीं जाने दिया I यदि पेट के अंदर गया तो पाचन हो गया, विस्मृति हो गई I जो भी सहजता से पी लिया वह व्यर्थ हो गया, फिर से हम वही कार्य करेंगे जो नहीं करना है,. इसलिए उसे गले में ही रहने दो I  

शिव का वैज्ञानिक महत्व – मंदिरों में शिवलिंग और सामने नंदी बैठा है, यही हम शिव मंदिरों में देखते हैं I मान्यता अनुसार पहले नंदी को पूजते फिर शिव की पूजा होती है I पूजा ये भाववाचक संज्ञा है I शिव लिंग को कभी भी पूरी प्रदक्षिणा नहीं करते तो आपको फिर से आकर मुड़ना हैं I इसके क्या पहलू हैं ? क्योंकि शिवलिंग न्यूक्लियर रिएक्टर है I शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चन्द्र माना है I आकाश में अर्धचंद्र को देखोगे तो शुक्र तारा भी दिखता है I शिवलिंग केवल उसका प्रतिक नहीं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक ज्योतिर्लिंग है I(आदि शंकराचार्य इसका महत्व जानते थे इसलिए उन्होंने यहाँ बारह स्थान ऐसे खोज़े जहाँ शिवलिंग की स्थापना की. जो गणितीय, भौमिक शास्त्र का अध्ययन करके गुरुत्वाकर्षण जहाँ ज्यादा है वहीँ पर की I शिवलिंग न्यूक्लियर रिएक्टर है I ये सभी स्थान एक ही पंक्ति में बद्ध है, जानकर ही शंकराचार्य ने ऐसे स्थानों पर ही ज्योतिर्लिंग स्थापित किये I)इसी वजह से शिवलिंग को कभी पूरी प्रदक्षिणा नहीं करते है क्योंकि ऐसा करने से उसका बुरा प्रभाव इंसान के ऊपर होगा I

अब जैसा कहा गया कि नंदी नपुंसकता, शिव उत्पत्ति है I बेल पत्रों में वीर्य वर्धक गुण हैं I शिवजी को बेल पत्र चढ़ाये जाते हैं (हनुमान जी को आक के फूल चढ़ाये जाते हैं I जिस से शक्ति याने वीर्य बीजों में शक्ति वर्धन होता है I हनुमान जी को काले उड़द भी चढ़ाते हैं, तेल भी लगाया जाता है I यह सब वर्जिश, वृद्धि के लिए होता है I यहाँ आपको एक उदाहरण देना चाहूँगी जिसका प्रयोग मेरे रोगी के ऊपर  इन्हीं चीजों को आधार मानकर किया था I उसको रोगी भी नहीं कहना चाहिए क्योंकि उक्त स्त्री को पांच वर्ष तक गर्भ धारणा नहीं हुई थी I यह रोग नहीं तो उसके शरीर में उपयुक्त हार्मोन्स के कमी के वजह से ऐसा हुआ था.I जब दोनों श्री और श्रीमती मेरे पास आये थे तो पति को भी कहा कि आप अपने रिपोर्ट लाइए I प्रताड़ित स्त्री हुई थी लेकिन कमी आदमी में हीं थी, यह परिक्षण के बाद सिद्ध हो गया था I फिर होम्योपैथीक दवाईयों के साथ मैंने बेल पत्र तथा काले उडद का उसे सेवन करने बताया था I उसका एक तरीका है. वह सब यहाँ चर्चा नहीं करूंगी, तो केवल यह बताने के लिए उदाहरण दिया कि एक वर्ष के अंदर उसके वीर्य में गुण आकर पांच वर्ष में तीन संताने भी हुईं I) यही सब हमें सहीं जानकारी के साथ लोगों को बताना है I  हमारे पास पुरा का पुरा ज्ञान का खजाना है, लेकिन कभी हमने उसे ठीक से खोलकर अंदर झांककर भी नहीं देखा I ये हमारी ही दुर्बुद्धि या आलस या अनिच्छा का उदाहरण ही है I

डॉ.नीलिमा तिग्गा

अजमेर, राजस्थान                                         

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