सनातन पूजन विधि में षोडशेपचार पूजन विधि सामान्य मानव के लिए सर्वोतम पूजन विधि है। इस विधि के द्वारा बहुत सी पूजा स्वंय सम्पन्न कर सकते है। प्रतिदिन घरो में होने वाली पंचोपचार पूजन विधि से विभिन्न यह पूजन विधि त्यौहारो पर अधिक प्रयोग में लाइ जाती है।
| 01 | ध्यान-आवाहन | सबसे पहले भक्ति भाव एवं मंत्रो द्वारा भगवान का ध्यान किया जाता है। आवाहन का अर्थ है पास लाना। जिस देवता की पूजा की जा रही है उससे निवेदन किया जाता है कि वे हमारे मूर्ति में निवास करें तथा तथा हमारी पूजा स्वीकार कर हमें आत्मिक बल एवं आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करें, हमारी मनोकामना पूर्ण करें। |
| 02 | आसन | ध्यान व आहाहन के बाद भगवान से प्रार्थना करें की वे आसन पे विराजमान हो। |
| 03 | पाद्य | पाद्यं, अर्ध्य दोनों ही सम्मान सूचक हैं। भगवान के प्रकट होने पर उनके हाथ पावं धुलाकर आचमन कराकर स्नान कराते हैं। |
| 04 | अर्ध्य | अर्ध्य पाद्यं, अर्ध्य दोनों ही सम्मान सूचक हैं। भगवान के प्रकट होने पर उनके हाथ पावं धुलाकर आचमन कराकर स्नान कराते हैं। |
| 05 | आचमन | अंजलि में जल लेकर पीना। आचमन तीन बार किया जाता है। इससे मन की शुद्धि होती है। |
| 06 | स्नान | भगवान के स्वागत एवं पूजन से पहले भगवान को शुद्ध जल से और पंचामृत स्नान कराया जाता है। पंचामृत स्नान के बाद फिर शुद्व जल से स्नान कराया जाता है। |
| 07 | वस्त्र | स्नान के बाद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, ऐसा भाव रखा जाता है कि हम ईश्वर को अपने हाथों से वस्त्र अर्पण कर रहे हैं या पहना रहे हैं। |
| 08 | यज्ञोपवीत | यज्ञोपवीत का अर्थ जनेऊ होता है। यह देवी को अर्पण नहीं किया जाता। यह सिर्फ़ देवताओं को ही अर्पण किया जाता है। |
| 09 | गंधाक्षत | स्नान व वस्त्र चढ़ाने के बाद अक्षत, रोली, हल्दी, चन्दन, अबीर, गुलाल भगवान को लगाया जाता है। महिलाएं गौरी को सिंदूर लगाती हैं। |
| 10 | पुष्प | जिस भगवान की पूजा हो रही है, उसके पसंद के फूल और उसकी माला उसे अर्पित करनी चाहिए। |
| 11 | धूप | फूल माला के बाद अगरबत्ती एवं धूप से भगवान का ध्यान एवं स्वागत करना चाहिए। |
| 12 | दीप | भगवान को दाहिने हाथ से धी का दीपक दिखायें। |
| 13 | प्रसाद नैवेद्य | भगवान को मिठाई का भोग लगाया जाता है। इसको ही नैवेद्य कहते हैं। अपने सामर्थ अनुसार भोग लगायें। |
| 14 | ताम्बूल, दक्षिणा, जल आरती | तांबुल का मतलब पान है। यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। ताम्बूल के साथ में पुंगी फल (सुपारी), लौंग और इलायची भी डाली जाती है। दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। द्रव्य के रूप में रुपए, स्वर्ण, चांदी कुछ की अर्पित किया जा सकता है। आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है। इसके बाद सभी पूजन की गई वस्तुओं एवं दीपक के चारो तरफ जल का छिडकाव किया जाता है। |
| 15 | मंत्र पुष्पांजलि | मंत्र पुष्पांजली मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं। |
| 16 | प्रदक्षिणा-नमस्कार, स्तुति | प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा। आरती के उपरांत भगवन की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा हमेशा घड़ी की सूई के चलने की दिशा में करनी चाहिए। स्तुति में क्षमा प्रार्थना करते हैं, क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें। |
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