प्रमुख आयोजन एवं मेले
-ः चैत्रीय नवरात्रि मेला :-
गहमर माँ कामाख्या धाम पर चैत्रीय नवरात्रि में लगने वाला मेला पूरे नौ दिनों तक पूरे हर्ष-उल्लास के साथ चलता है। प्रातःकाल होने वाली आरती में दूर-दराज से आए भक्त सम्मिलित होते हैं। पूरे मंदिर परिसर में चारों तरफ ढोल-मंजीरे की आवाज गूँजने लगती है। आरती के बाद प्रसाद वितरण होता है और मंदिर भक्तों के लिए दोपहर 12 बजे तक के लिए खोल दिया जाता है। मंदिर परिसर में बने हॉल में भक्त श्रद्धा के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। इस नवरात्रि में श्रद्धालु अपने सामर्थ्य के अनुसार माँ का श्रृंगार भी कराते हैं। मेले को देखने एवं दर्शन-पूजन करने लाखों की संख्या में भक्त आते हैं।
नवरात्रि में अष्टमी की रात्रि “निशा पूजन” का आयोजन होता है। मध्यरात्रि में शुरू होने वाली इस पूजा के लिए मंदिर रात्रि 10 बजे बंद कर दिया जाता है। साफ-सफाई के बाद परिसर को सजाया जाता है। माँ का श्रृंगार होता है। ठीक 12 बजे शुरू होती है विशेष निशा पूजा। पूजा, आरती के बाद भक्त माँ का दर्शन करते हैं। अगले दिन तड़के सुबह नवमी तिथि शुरू हो जाती है। मंदिर प्रांगण में बने हवन-कुंड में भक्तों द्वारा हवन किया जाता है। मंदिर प्रांगण के पास ही घुड़दौड़ का आयोजन होता है। यू०पी० और बिहार से लोग इस आयोजन में हिस्सा लेने आते हैं। घुड़दौड़ को देखने दूर-दराज से लोग आते हैं। मेले में सेवा शिविर भी लगाए जाते हैं। भंडारे का आयोजन भी होता है। बच्चों के लिए झूले, सर्कस, खिलौनों की दुकानें भी मेले में मौजूद रहती हैं
घुड़दौड़ :-
नवमी तिथि के दिन माँ के मंदिर के पास कबीना मंत्री ओमप्रकाश सिंह के द्वारा घुड़दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर उ०प्र० और बिहार के प्रसिद्ध घुड़सवार हिस्सा लेते हैं। इस आयोजन को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
पूर्णवासी का मेला
माँ के धाम में चैत्रीय पूर्णमासी को भी भव्य मेले का आयोजन होता है। आज के मेले की खासियत यह होती है कि आज का मेला औरतों के लिये लगता है। कहा जाता है कि चैत्रीय नवमी के दिन औरतें माता पूजन एवं धार्मिक क्रिया-कलापों में व्यस्त रहती हैं। वह माँ के दरबार में नहीं जा पाती हैं। औरतें पूर्णमासी को माँ के दर्शन करती हैं और अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ मेले से खरीदती हैं। आज भी यह मेला विशुद्ध रूप से ग्रामीण परिवेश के अनुसार लगता है। मेले में घरेलू उपयोग की चीजें ही अधिक बिकती हैं।
श्रावणी मेला
माँ कामाख्या धाम में पूरे सावन मेले का आयोजन रहता है। जगह-जगह झाँकियाँ, झूले इत्यादि लगाए जाते हैं। इस माह में सुहागिन औरतें माँ को सिन्दूर अर्पित करती हैं। चढ़ाए हुए सिन्दूर को अपने सिन्दोरा (विवाह के लकड़ी के बने जिस पात्र में रखकर सिन्दूरदान होता है) में रखती हैं और माँ से प्रार्थना करती हैं कि वह सदा सुहागिन रहें।
चौल कर्म संस्कार
माँ के दरबार में होने वाले चौलकर्म कार्यक्रम की छटा देखने लायक होती है। जगह-जगह रंग-बिरंगे कपड़ों में उधम मचाते बच्चे, सोलह श्रृंगार से सजी नव-विवाहिताएँ हर तरफ घूमती नजर आती हैं। पारंपरिक देवी गीत गाती औरतें, बैण्ड-बाजे की धुन पर थिरकते परिवार के सदस्य और कैंची-छुरे के डर से बिलखते मुंडन करते बच्चे। कहीं भोजन तो कहीं चाट-सामोसे खाते नवयुवक-नवयुवतियाँ। हर तरफ खुशियों का माहौल होता है। मंदिर परिसर में हर तरह मजमा लगा रहता है। सभी एक-दूसरे की सेवा में लगे रहते हैं। गाड़ियों का शोर, ट्रैक्टर पर सवार होकर आती-जाती ग्रामीण महिलाएँ माँ के भक्ति गीतों से सबको मंत्रमुग्ध कर देती हैं। चौलकर्म संस्कार के बारे में विस्तार से जानीये
वैवाहिक कार्यक्रम
माँ के दरबार में अब धीरे-धीरे वैवाहिक कार्यक्रम का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अमीरी-गरीबी की परिपाटी से हटकर लोग माँ के दरबार में पंजीकरण कराकर वैवाहिक कार्यक्रम सम्पन्न करते हैं। इसके लिये मंदिर प्रशासन ने पूरी व्यवस्था भी कर रखी है। मंदिर के पास ही आवश्यक सामान उपलब्ध है। भोजन तथा जलपान की व्यवस्था के लिए कई निजी होटल भी परिसर में ही उपलब्ध हैं।
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