चौलकर्म संस्कार

चौलकर्म संस्कार

गहमर गाँव की नींव माँ कामाख्या देवी के आशीर्वाद से पड़ी, इस लिये गहमर के लोग अपने पुत्र और पुत्री का प्रथम चौलकर्म संस्कार माँ कामाख्या देवी के धाम पर कराते हैं। चौलकर्म संस्कार से पूर्व बच्चों का बाल नहीं कटाया जाता है। गहमर में चौलकर्म संस्कार का आयोजन बहुत धूम-धाम से आयोजित होता है। सुबह गंगा पूजन से रात्रि में प्रीति भोज तक होने वाले इस कार्यक्रम की हर रस्म अपनी एक विशेषता लिए होती है।

बालक-बालिका के चौलकर्म संस्कार की पूर्व नियोजित तिथि से एक दिन पूर्व रात में घर की औरतों द्वारा शुद्ध देशी घी में पूजन के लिए पूरी तथा बखीर बनाई जाती है। कुछ परिवारों में अगले दिन माँ कामाख्या धाम पर महिलाओं को खिलाने के लिए पूरी भी रात में बना लिया जाता है। इस भोजन बनाने का एक मजेदार पहलू यह भी है कि आज जिस बच्चे का मुंडन होना है उसके मामा बैठकर पूरी बेलते हैं। पूरी बेलते समय उनको गाँव की लड़कियों एवं औरतों द्वारा दी गई गालियाँ सुनने के साथ-साथ तरह-तरह के चुहल भी झेलने होते हैं। अब यह प्रथा बंद होने के कगार पर है, मगर कुछ परिवारों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है।

चौलकर्म संस्कार वाले दिन घर-परिवार की औरतें बैण्ड-बाजे के साथ पारंपरिक गीत गाते हुए गंगा घाट पहुँचती हैं। परिवार की एक महिला गंगा माँ का पूजन कर आशीर्वाद एवं चौलकर्म संस्कार के लिये माँ गंगा से इजाजत माँगती है। इस पूजन के दौरान एकत्र सभी महिलाएँ गंगा मैया के पारंपरिक भक्ति गीत गाती हैं। पूजन के उपरांत बालक-बालिका के सिर के बाल का कुछ हिस्सा काटकर गंगा मैया को चढ़ाया जाता है। कटे हुए बाल को बालक-बालिका की फुआ, मौसी, बहन या अन्य परिवार की महिलाएँ अपने आँचल में लेती हैं, जिसे “लट लेना” कहा जाता है। लट लेने के एवज में उनको रुपये-पैसे या सोने-चाँदी के जेवर, जिसकी जैसी श्रद्धा रहती है, दिया जाता है।

गंगा किनारे बाल कटने के बाद बालक के परिवार-खानदान, मित्र एवं रिश्तेदार के स्त्री और पुरुष सभी एक नाव में बैठते हैं। स्त्रियाँ पारंपरिक गीत गाती हैं और पुरुष नाव चलाते हैं। नाव से सारे लोग गंगा के दूसरे किनारे पर जाते हैं। स्थानीय भाषा में इसे आर-पार करना कहा जाता है। दूसरे किनारे पहुँचने पर पुनः गंगा मैया का पूजन उसी महिला द्वारा किया जाता है जिसने पहले किनारे पर गंगा पूजन किया था। दूसरे किनारे पर पूजन के बाद नाव पहले किनारे पर आने लगती है।

दूसरे किनारे से पहले किनारे पर आने वाली नाव जाती तो सीधी है मगर वह सीधी आती नहीं है। आते समय वह गंगा की बीच धारा में पहुँचकर गंगा की परिक्रमा करती है। स्थानीय भाषा में गंगा की परिक्रमा करने को झिझरी खेलना कहा जाता है। (बीच धारा में नाव द्वारा गंगा की धारा में एक ही जगह 5 से 7 बार नाव को गोलाई में घुमाना झिझरी कहलाता है)।

आर-पार के बाद घाट पर पुरुषों के लिए नाश्ते का प्रबंध होता है। नाश्ते के बाद पुरुष सीधे अपने घर चले आते हैं। महिलाएँ वहीं निजी साधनों द्वारा माँ कामाख्या के दरबार के लिए प्रस्थान कर जाती हैं। धाम पर आने के बाद सर्वप्रथम माँ कामाख्या का पूजन होता है। पूजन के बाद शुरू होता है चौलकर्म संस्कार। नाई द्वारा बच्चों का मुंडन करने से पहले नेग लिया जाता है। इस स्थान पर भी लट लेने की रस्म निभाई जाती है। माँ के धाम पर बाल को पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। मुंडन के बाद साथ गई महिलाओं को भोजन कराया जाता है। परिवार के पुरुष वर्ग के लोग भी इसी स्थान पर भोजन कर लेते हैं।

भोजन के बाद सभी घर लौट आते हैं, परन्तु परिवार की वह औरत जिसने सुबह गंगा पूजन किया था अपने परिवार के कुछ सदस्यों और पूजन सामग्री लेकर गाँव के कुल देवी-देवताओं की पूजा करने चली जाती है।

चौलकर्म संस्कार के बाद रात्रि में प्रीति भोज का आयोजन किया जाता है। प्रीतिभोज के बाद पूरे दिन चलने वाला मुंडन संस्कार का आयोजन खत्म हो जाता है। अगले दिन बाहर से आए परिजनों को यथाशक्ति नेग देकर विदा किया जाता है। गहमर में होने वाला यह आयोजन काफी लोकप्रिय है। बदलते परिवेश में अब मुंडन संस्कार में रात भर चलने वाले गीत-संगीत का भी आयोजन किया जाता है।