इतिहास

-ः माँ कामाख्या मंदिर – गहमर :-

एशिया के सबसे बड़े गाँव गहमर में स्थित आदि शक्ति माँ कामाख्या का मंदिर शक्ति पीठ में अलग महत्व रखता है। इस पवित्र भूमि में कभी जमदग्नि, विश्वामित्र, गाधि-तनय इत्यादि ऋषि-मुनियों का सतसंग समागम हुआ करता था। विश्वामित्र ने यहाँ एक महायज्ञ किया था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने यहाँ से आगे बढ़कर बक्सर में ताड़का नामक राक्षस का वध किया था।

मंदिर की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि पूर्व काल में फतेहपुर सीकरी में सिकरवार राजकुल पितामह खाबड़ जी महाराज ने कामगिरि पर्वत पर जाकर माँ कामाख्या देवी की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न माँ ने कालांतर तक सिकरवार वंश की रक्षा करने का वरदान दिया। सन् 1530 में बाबर के साथ हुए मालवा युद्ध में पराजित होने के बाद हताश एवं परेशान महाराज धामदेव को माँ ने काशी क्षेत्र में जाने एवं वहीं अपना निवास बनाने का आदेश दिया। माँ का आदेश मानकर राजा धामदेव फतेहपुर सीकरी से अपने पुरोहित गंगेश्वर उपाध्याय को साथ लेकर काशी क्षेत्र के लिए चल दिए। उस समय यह पूरा क्षेत्र काशी प्रांत कहा जाता था। आज भी यह क्षेत्र लहुरीक काशी के नाम से ही जाना जाता है।

कहा जाता है कि काशी के इस क्षेत्र में चेरू राजा शशांक का शासन था। वह काफी क्रूर था, उससे यहाँ की प्रजा काफी दुखी थी। धामदेव ने अपने साथ आए लड़ाकों के साथ उसके साथ युद्ध किया, जिसमें शशांक पराजित हुआ। उसकी पराजय के बाद धामदेव राव ने यहाँ अपना राज्य स्थापित कर लिया। गंगा की पावन तलहटी में बसे इस क्षेत्र में एक छोटा सा स्थान ऐसा था जो गंगा की बाढ़ के समय सुरक्षित माना जाता था, जिसे सकराडीह कहा जाता था। सकराडीह का मतलब ही होता है छोटा स्थान या तंग स्थान।

धामदेव ने उस स्थान को हर तरफ से सुरक्षित मानते हुए वहीं माँ कामाख्या देवी की एक प्रतिमा नीम के पेड़ के पास मंदिर बनाकर स्थापित कर दी। मंदिर में स्थापित प्रतिमा के योनि मंडल में माँ भगवती का साक्षात निवास है। इस योनि मंडल की स्थापना के कारण यहाँ माँ कामाख्या का मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर पहले कहाँ स्थित था, इस संबंध में लोगों में मतभेद है। कुछ का कहना है कि वर्तमान समय में बने डाक बंगले के पास यह मंदिर स्थापित था। कुछ लोगों का कहना है कि मंदिर शुरू से वहीं था जहाँ आज है।

समय के साथ-साथ माँ कामाख्या का महत्व बढ़ता जा रहा था। दूर-दराज से भक्त माँ के भवन पहुँचने लगे थे, मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहा जाता है कि भारत में जब मुगल शासन काल शुरू हुआ और मुगलों द्वारा भारत में मंदिरों को गिराने और उनकी जगह मस्जिद बनाने का काम शुरू हुआ, उसी में माँ कामाख्या के भवन को भी मुगल शासक औरंगजेब द्वारा तुड़वा दिया गया। कुछ का मानना है कि अंग्रेजों के शासन काल में इसे तोड़ा गया।

वर्ष 1840 ई० तक मंदिर में खंडित मूर्तियों की ही पूजा होती रही। इनमें प्रमुख रूप से काली, महाकाली, सरस्वती, यक्ष, यक्षिणी, भैरों व चेरो-खरवार की मूर्तियाँ थीं। सन् 1841 ई० में अपनी गहमर के स्वर्णकार तेजमन ने मनोकामना पूर्ण होने के बाद इस मंदिर के पुनःनिर्माण का बीड़ा उठाया। मंदिर का निर्माण प्राकृतिक यंत्र व्यवस्था के आधार पर काशी के महापंडितों को बुलाकर कराया गया। निर्माण के बाद मंदिर में खंडित मूर्ति के स्थान पर नई मूर्ति की स्थापना की गई।

जब भारत में अंग्रेजी शासन के जुल्म बढ़ने लगे तो यहाँ के लोग आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और मंदिर के निर्माण का कार्य बहुत धीमी गति से होने लगा। वर्ष 1980 में गहमर के जनमेजय सिंह ने अपनी मनोकामना पूर्ण होने के बाद मंदिर परिसर के सुंदरीकरण का कार्य शुरू कराया। मंदिर का जीर्णोद्धार प्रारंभ हुआ। माँ के अगल-बगल सरस्वती व लक्ष्मी की मूर्ति तथा मुख्य द्वार पर गणेशजी की काली मूर्ति लगाई गई।

गाजीपुर-बारा मार्ग मुख्य मार्ग पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी द्वार के शक्ल का मुख्य स्वागत द्वार बनाया गया। मंदिर के समीप लगभग एक बीघे में तालाब बनने का निर्माण श्रमदान से हुआ। मंदिर परिसर में ही विवाह भवन, सांस्कृतिक मंच, अतिथि भवन एवं पुलिस चौकी का निर्माण कराया गया। मंदिर के मुख्य द्वार पर एक गुफा का निर्माण कराकर उस शेर की प्रतिमा एवं धातु का बना हुआ 20 फीट ऊँचा त्रिशूल स्थापित किया गया।

गर्भगृह के नीचे भैरों बाबा का मंदिर स्थापित किया गया। मंदिर परिसर में स्व-चलित झाँकियाँ बनाकर लगाई गईं। सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं अन्य आयोजनों के लिये मंदिर के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा एक मंच बनवाया गया। प्रसाद एवं जलपान के सुनियोजित बाजार का निर्माण भी मंदिर के पास ही कराया गया। वन विभाग द्वारा डाक बंगले की स्थापना की गई।