
कार्तिक कृष्ण पक्ष की पावन त्रयोदशी तिथि, जिसे संपूर्ण आर्यावर्त में धनतेरस और भगवान धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है, साक्षात आरोग्यता, अक्षय ऐश्वर्य और जगदम्बा की सात्विक कृपा का महापर्व है। पिछले कुछ दशकों से इस परम पुनीत बेला पर कार, मोटरसाइकिल या अन्य आधुनिक वाहन खरीदने की एक नई लोक-परंपरा ने जन्म लिया है। परंतु, इस बदलते परिवेश के साथ ही सनातन धर्मावलंबियों के मानस पटल पर एक गंभीर वैचारिक और शास्त्रीय भ्रम भी उत्पन्न हो गया है। रूढ़िवादी मान्यताओं और सामान्य ज्योतिषीय चर्चाओं में यह कहा जाता है कि धनतेरस के दिन लोहा और कांच (शीशा) खरीदना वर्जित या अशुभ होता है। चूँकि प्रत्येक आधुनिक वाहन का मूल आधार ही लौह धातु और शीशे की खिड़कियों से निर्मित होता है, इसलिए भक्तों के मन में यह संशय उठना स्वाभाविक है कि इस विरोधाभास के रहते वाहन खरीदना कल्याणकारी कैसे हो सकता है? इसी असमंजस को दूर करते हुए और धर्म-सम्मत सत्य को उजागर करते हुए माँ कामाख्या मंदिर के महंत आकाश तिवारी ने सूक्ष्म ज्योतिषीय विश्लेषण और उच्च आध्यात्मिक दृष्टिकोण साझा किया है, ताकि साधकों का भ्रम समूल नष्ट हो सके।
सनातन ज्योतिष और तंत्र विज्ञान के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ और धातु का संबंध ब्रह्मांडीय ऊर्जा तथा विशिष्ट ग्रहों से होता है। लौह धातु को न्याय के अधिपति शनिदेव का प्रतीक माना जाता है, जो कठोर परिश्रम, संघर्ष और कर्मफल के संवाहक हैं। वहीं दूसरी ओर, कांच या शीशे का संबंध छाया ग्रह राहु से जोड़ा जाता है, जो मतिभ्रम, चंचलता और राहु की तामसिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। चूँकि धनतेरस का उत्सव साक्षात स्थिर लक्ष्मी और धन्वंतरि भगवान के सात्विक प्राकट्य का दिन है, इसलिए इस दिन सीधे तौर पर कच्चा लोहा, धारदार औजार, कैंची, चाकू या राहु से प्रभावित मतिभ्रम पैदा करने वाला कांच घर लाना शास्त्रों में निषेध बताया गया है, क्योंकि ये सामग्रियां घर की शांति में व्यवधान उत्पन्न कर सकती हैं।
परंतु, इस शास्त्रीय निषेध और आधुनिक वाहन की खरीदारी के मध्य जो सूक्ष्म भेद है, उसे केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही समझा जा सकता है। माँ कामाख्या के परम साधक महंत आकाश तिवारी जी स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रों में जिस लोहे को वर्जित किया गया है, वह ‘कच्चा लोहा’ या ‘विध्वंसक अस्त्र-शस्त्र’ हैं, जो काटने या चोट पहुंचाने के काम आते हैं। इसके विपरीत, एक आधुनिक वाहन केवल जड़ लोहा नहीं है, बल्कि वह विज्ञान, शिल्प, और गति का एक अत्यंत परिष्कृत स्वरूप है। वाहन में लोहे के साथ-साथ एल्युमिनियम, ताम्र, रबर और कई अन्य सामग्रियां मिली होती हैं, जो मिलकर एक ‘यंत्र’ का निर्माण करती हैं। सनातन परंपरा में ‘यंत्र साधना’ का विशेष महत्व है और जब लोहा एक कल्याणकारी यंत्र का रूप ले लेता है, तो उस पर शनिदेव की नकारात्मकता के बजाय कर्मयोग की सकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है। वाहन किसी मनुष्य के जीवन को गति, उन्नति और आजीविका प्रदान करने का माध्यम है, इसलिए यह कोई दरिद्रता लाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवन को सुगम बनाने वाला साक्षात कुबेर का साधन है।
इसी प्रकार, वाहन में प्रयुक्त होने वाला शीशा किसी भ्रम या विनाश का परिचायक नहीं है। वह तो चालक को ‘सामने का स्पष्ट मार्ग’ दिखाने वाली ‘दिव्य दृष्टि’ और ‘मार्गदर्शन’ का प्रतीक है। राहु का कुप्रभाव तब होता है जब बुद्धि भ्रमित हो, परंतु गाड़ी का यह पारदर्शी शीशा तो यात्रा को सुरक्षित और स्पष्ट बनाता है, जिससे राहु का दोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है। प्राचीन काल में जब अश्व, गज और रथ को समृद्धि का सूचक माना जाता था, आज के कलयुग में वाहन ही आधुनिक युग का ‘रथ’ है। जब कोई अपनी न्यायसंगत आजीविका से परिवार के कल्याण हेतु इस आधुनिक रथ को घर लाता है, तो वह साक्षात लक्ष्मी की स्थिरता का ही रूप होता है।
महंत जी इस भ्रम का निवारण करते हुए अंत में लोक कल्याणकारी विधान बताते हैं कि सनातन संस्कृति में सबसे बड़ा बल ‘मंत्र और भाव शुद्धि’ में है। जब धनतेरस की शुभ वेला पर नया वाहन घर की देहरी पर आता है, तो उस पर रोली, अक्षत और कुमकुम से पवित्र ‘स्वस्तिक’ का निर्माण किया जाता है, जो साक्षात गणपति का स्वरूप है। उस पर मंगलकारी कलावा बांधकर, कर्पूर से आरती उतारकर और जगदम्बा के चरणों का पवित्र सिंदूर लगाकर जब वाहन पूजा का शास्त्रीय विधान संपन्न होता है, तब धातु का वह जड़ रूप पूरी तरह चैतन्य और दोषमुक्त हो जाता है। सात्विक मंत्रोच्चार और माँ कामाख्या के आशीर्वाद से लोहे और शीशे का प्रत्येक कल्पित दोष तत्काल भस्म हो जाता है और वह वाहन आपके परिवार के लिए सुख, सौभाग्य और समृद्धि का अखंड कारक बन जाता है। इसलिए, बिना किसी संशय के पूर्ण श्रद्धाभाव से इस महापर्व का आनंद उठाएं।
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