महर्षि वाल्मीकि के पावन आश्रम में बिताया गया समय माता सीता के जीवन का अत्यंत धैर्यपूर्ण और अलौकिक अध्याय था। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने जन-अपवाद के कारण गर्भवती माता सीता का परित्याग कर दिया था, तब महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अपनी पुत्री के समान आश्रय दिया। उसी तपोवन की शांत और पवित्र वातावरण में माता सीता ने अपने प्रथम तेजस्वी पुत्र लव को जन्म दिया। बालक लव महर्षि के आश्रम में ऋषिकुमारों के साथ खेलते, वेदों का अध्ययन करते और माता सीता के अगाध वात्सल्य में बड़े हो रहे थे।
एक दिन की बात है, माता सीता को आश्रम से थोड़ी दूर स्थित नदी से जल लाने और समिधा (यज्ञ की लकड़ियां) एकत्र करने जाना था। सामान्यतः वे जब भी किसी कार्य से बाहर जाती थीं, तो बालक लव को महर्षि वाल्मीकि के पास छोड़ जाती थीं। उस दिन जब सीता जी लव को सुलाकर जाने लगीं, तो उन्होंने देखा कि महर्षि वाल्मीकि गहरे ध्यान और समाधि में लीन थे। माता सीता के मन में यह विचार आया कि ऋषिवर तो ध्यानमग्न हैं, यदि इस बीच बालक की नींद खुल गई और वह रोते-बिलखते आश्रम से बाहर निकल गया, तो कोई हिंसक पशु उसे क्षति पहुँचा सकता है। ध्यान भंग करना उचित न समझते हुए माता सीता ने सोए हुए बालक लव को धीरे से अपनी गोद में उठाया और उसे अपने साथ ही नदी की ओर ले गईं।
कुछ समय पश्चात जब महर्षि वाल्मीकि की समाधि टूटी, तो उनकी दृष्टि स्वाभाविक रूप से बालक के झूले पर गई। झूला खाली देखकर महर्षि स्तब्ध रह गए। उन्होंने आश्रम के कोने-कोने में बालक को पुकारा और खोजा, परंतु वह कहीं दिखाई नहीं दिया। ऋषिवर के मन में यह आशंका घर कर गई कि शायद कोई हिंसक वन्यजीव या राक्षस बालक को उठाकर ले गया है। महर्षि वाल्मीकि अत्यंत चिंताकुल हो उठे और सोचने लगे कि जब सीता वापस आएंगी और अपने एकमात्र पुत्र को अनुपस्थित पाएंगी, तो उन पर दुखों का क्या पहाड़ टूटेगा। पहले से ही पति-वियोग और राजमहल के सुखों से वंचित सीता पुत्र-शोक का यह अपार कष्ट सहन नहीं कर पाएंगी और अपने प्राण त्याग देंगी।
माता सीता को इस संभावित महान शोक और कष्ट से बचाने के लिए महर्षि वाल्मीकि ने अपनी दिव्य तपोबल का प्रयोग करने का निर्णय लिया। उन्होंने आश्रम में कुशा (एक विशेष प्रकार की पवित्र घास, जिसका उपयोग पूजा-पाठ और यज्ञों में किया जाता है) को एकत्रित किया। ऋषिवर ने अपने योगबल, तपोबल और वैदिक मंत्रों के उच्चारण से उस कुशा को अभिमंत्रित किया और देखते ही देखते उस घास के तिनकों से बिल्कुल लव जैसा ही सुंदर, सुकुमार और तेजस्वी बालक निर्मित कर दिया। वह बालक हूबहू लव की भाँति ही मुस्कुरा रहा था और क्रीड़ा करने लगा।
थोड़ी देर बाद जब माता सीता नदी से जल लेकर लौटीं, तो लव उनकी गोद में खेल रहा था। आश्रम में पहुँचकर जब उनकी दृष्टि महर्षि के पास खेल रहे दूसरे बालक पर पड़ी, तो वे आश्चर्य से चकित रह गईं। वह बालक रूप, रंग, आकार और मुखाकृति में बिल्कुल उनके पुत्र लव जैसा ही था। माता सीता ने विस्मय से महर्षि वाल्मीकि की ओर देखा और जिज्ञासा प्रकट की। तब महर्षि ने शांत और दयालु भाव से मुस्कुराते हुए पूरी घटना का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब वे समाधि से उठे और झूला खाली पाया, तो उन्हें लगा कि लव को कोई संकट घेर चुका है। इसलिए सीता को पुत्र-शोक से बचाने हेतु उन्होंने अपने तपोबल से इस दूसरे बालक की रचना की है।
महर्षि वाल्मीकि ने माता सीता से कहा कि चूंकि यह बालक अब उत्पन्न हो चुका है, इसलिए यह भी तुम्हारा ही पुत्र है और ईश्वर का प्रसाद है। जिस प्रकार लव तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र है, उसी प्रकार यह बालक भी तुम्हारा अनुज पुत्र माना जाएगा। चूंकि इस बालक का निर्माण डाभ अथवा पवित्र ‘कुश’ नामक घास से हुआ था, इसीलिए महर्षि ने इसका नाम ‘कुश’ रखा। माता सीता ने अश्रुपूरित नेत्रों से महर्षि के चरणों में प्रणाम किया और बालक कुश को भी अपने हृदय से लगा लिया। इसके बाद लव और कुश दोनों भाई महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में एक साथ ऋषियों के संरक्षण में अस्त्र-शास्त्र और शास्त्रविद्या में पारंगत हुए तथा आगे चलकर रामायण की गाथा के महान नायक बने।
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