गर्भगृह प्रवेश द्वारा और सम्‍मुख दर्शन का महत्‍व

आप संसार के किसी मंदिर में जाएँ, वहाँ गर्भगृह में आपको एक प्रवेश द्वार मिलेगा, जो गर्भगृह की ऊँचाई कितनी भी हो, प्रवेश द्वार हमेशा छोटा ही रहेगा, व्यक्ति को झुककर जाना होगा। और अधिकांश मंदिरों में प्रवेश द्वार देवी-देवता के सामने ही होगा। कभी आपने सोचा है कि मंदिर की वास्तुकला बदल जाती है, मंदिर का नक्शा बदल जाता है, सब कुछ बदल सकता है, लेकिन 95 प्रतिशत प्राचीन मंदिरों के गर्भगृह में प्रवेश का मार्ग एकल प्रवेश द्वार के रूप में क्यों रहता है। चाहे वह मंदिर भूधरा के किसी भाग पर हो। और जब एक ही प्रवेश द्वार मान्य है, तो हम अपनी सुविधा, पहुँच का लाभ उठाकर अन्य दरवाजों से सम्मुख दर्शन छोड़कर प्रवेश क्यों करते हैं। क्या इस दर्शन से उस आध्यात्मिक सुख या फल की प्राप्ति होगी, जिसके लिए आप दर्शन-पूजन करने आये हैं। फल प्राप्त हो या न हो, यह तो भविष्य की बात है, लेकिन इतना तो तय है कि यदि आप सम्मुख दर्शन नहीं करते, प्रवेश द्वार से प्रवेश नहीं करते, तो आपको आध्यात्मिक अथवा दर्शन सुख का लाभ तो नहीं मिलेगा।

मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार केवल पत्थरों से बना एक दरवाजा नहीं, बल्कि लौकिक जीवन से देवसत्ता के सान्निध्य तक पहुँचने की धार्मिक मर्यादा है। सनातन मंदिर परंपरा में गर्भगृह वह पवित्रतम स्थान है, जहाँ आराध्य देव की प्रतिमा, शिवलिंग अथवा विग्रह प्रतिष्ठित होता है। इसी कारण मंदिर की योजना में गर्भगृह, उसके प्रवेश द्वार, द्वारशाखाओं, देहरी, द्वारपालों और दर्शन की दिशा का विशेष महत्त्व है। इस व्यवस्था का प्रमाण प्राचीन भारतीय वास्तु-ग्रंथों में मिलता है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता के अध्याय 56, जिसे ‘प्रासादलक्षण’ कहा गया है, में मंदिर निर्माण, गर्भगृह और उसके द्वार के अनुपात का वर्णन है। श्लोक 56.10 में मंदिर की योजना के मध्य भाग में प्रवेश द्वार रखने और दिशाओं को व्यवस्थित रखने का विधान बताया गया है। श्लोक 56.12 में गर्भगृह के प्रवेश द्वार की चौड़ाई और ऊँचाई का अनुपात दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि गर्भगृह का द्वार वास्तु-योजना का निर्धारित अंग है, कोई ऐसा रास्ता नहीं, जिसे सुविधा के अनुसार मनमाने ढंग से बदल दिया जाए। मंदिर स्थापत्य पर प्रकाशित The Structural Temples of Gujarat में भी गर्भगृह के द्वार को सामान्यतः उसकी सामने वाली दीवार के मध्य में स्थित बताया गया है और यह उल्लेख मिलता है कि प्राचीन वास्तु-ग्रंथों में द्वार की स्थिति, माप और दिशा के लिए नियम निर्धारित किए गए थे।यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए कि मुख्य मंदिर प्रवेश द्वार और गर्भगृह का प्रवेश द्वार एक ही चीज नहीं हैं। मुख्य द्वार से श्रद्धालु मंदिर परिसर में प्रवेश करता है, जबकि गर्भगृह का द्वार उसे आराध्य के दर्शन के निर्धारित मार्ग तक पहुँचाता है। अनेक मंदिरों में मंडप, अंतराल और गर्भगृह एक सीध में बने होते हैं, जिससे भक्त का ध्यान प्रवेश से लेकर विग्रह के दर्शन तक उसी आध्यात्मिक केंद्र पर बना रहे। गर्भगृह की वास्तु-व्यवस्था में इस सीध का अपना स्थान है। इसलिए किसी मंदिर में जब सामने से दर्शन का निर्धारित मार्ग हो, तो केवल भीड़ से बचने, जल्दी पहुँचने अथवा अपनी सुविधा के लिए किसी दूसरे द्वार को गर्भगृह में प्रवेश का समान विकल्प मान लेना उचित नहीं है। देवालय की चौखट को केवल आने-जाने की जगह नहीं, बल्कि एक मर्यादा की सीमा माना गया है।

मां कामाख्‍या दरबार के मंहत आकाश तिवारी
मां कामाख्‍या धाम के महंत आकाश तिवारी जी

माँ कामाख्या धाम के महंत आकाश तिवारी जी अखंड गहमरी से वार्ता के दौरान बताते हैं कि गर्भगृह के द्वार पर अंकित देवी-देवताओं, द्वारपालों, शुभ चिह्नों और अलंकरणों का भी धार्मिक स्थापत्य में विशेष स्थान रहा है। इनका उद्देश्य केवल सजावट नहीं, बल्कि मंदिर के पवित्र स्वरूप को प्रकट करना और श्रद्धालु को देवदर्शन की गंभीरता का बोध कराना है। अतः गर्भगृह के प्रवेश द्वार को मंदिर की धार्मिक योजना और पूजा-पद्धति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। गर्भगृह के सामने एक निर्धारित द्वार है और दर्शन उसी दिशा से होते हैं, भक्त को उसी मार्ग से दर्शन करना चाहिए; किसी पार्श्व मार्ग, सेवा-द्वार अथवा दूसरे प्रवेश को अपनी इच्छा से मुख्य दर्शन-द्वार का विकल्प नहीं बना लेना चाहिए।वास्तु-ग्रंथों में मंदिर के द्वारों की दिशा के विषय में नियम मिलते हैं, लेकिन उनसे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं कि संसार के प्रत्येक मंदिर का गर्भगृह पूर्व दिशा में ही खुलना चाहिए अथवा प्रत्येक मंदिर में केवल एक ही द्वार होना अनिवार्य है। बृहत्संहिता में मंदिरों के अलग-अलग प्रकारों का उल्लेख भी है; भारतीय मंदिर स्थापत्य में क्षेत्र, देवता, काल और स्थापत्य-परंपरा के अनुसार विविध रूप विकसित हुए हैं।

किसी दूसरे द्वार से प्रवेश कर लेने मात्र से धनहानि, रोग, अनिष्ट अथवा पूजा निष्फल होने जैसी निश्चित भविष्यवाणियाँ करना प्रमाणित धार्मिक निष्कर्ष नहीं, लेकिन गर्भगृह का प्रवेश द्वार भक्त को याद दिलाता है कि देवालय में मनमानी नहीं, विनय लेकर पहुँचना है; वहाँ अपनी सुविधा को परंपरा से ऊपर नहीं रखना है। मंदिर के नियमों का पालन, आराध्य के प्रति श्रद्धा और दर्शन की मर्यादा, यही वह आधार है, जो सनातन पूजा-परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखता है। देवदर्शन में केवल गर्भगृह तक पहुँच जाना पर्याप्त नहीं; निर्धारित मार्ग से, श्रद्धा और मर्यादा के साथ आराध्य के सम्मुख उपस्थित होना ही पूजा की सच्ची भावना है।

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